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मां, मातृभाषा और मातृभूमि से प्रेम सीमाओं में नहीं बंधते

देश के प्रमुख तीन साहित्यिक समूह- शब्द एवं राग, नारी अस्मिता एवं साहित्य अर्पण ने साहित्यिक त्रिवेणी - ‘रागार्पणस्मिता’ का गठन कर संयुक्त रूप से अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के विभिन्न देशों में निवासरत भारतीय मूल के साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोते हुए वैश्विक पटल पर भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार, साहित्यिक परिचर्चा, संगोष्ठी के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर

तीन दिवसीय डिजिटल साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया। नारी सशक्तीकरण की अवधारणा को साकार करते हुए तीनों ही साहित्यिक समूहों की संयोजक डॉ. रचना निगम, रुपल उपाध्याय बड़ौदा और नेहा शर्मा दुबई के साथ नीरज जैन उदयपुर के सहयोग से संपन्न हुए इस सम्मेलन में देश-विदेश के हिंदी भाषा के कई मूर्धन्य साहित्यकारों ने भाग लिया। बांसवाड़ा राजस्थान का प्रतिनिधित्व करते हुए महेश पंचाल माही ने

हिंदी को भारत की राजभाषा और राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलने और किन महान विभूतियों का इसमें योगदान रहा, इस विषय की जानकारी सांझा की। भाषा के बदलते स्वरूप विषय पर परिचर्चा अंतर्गत आलेख और लघु कथाओं की प्रस्तुतियां दी गयी तो वर्तमान वैश्विक माहौल पर, कोरोना वायरस संक्रमण और इसके व्यापक प्रभाव, नारी के प्रति अत्याचार और नारी के सशक्तिकरण पर, अप्रवासी भारतीयों का भारत को योगदान,

सीमाओं की सुरक्षा और साहित्यकारों की भूमिका जैसे अनेक समसामयिक विषयों पर चर्चा एवं वैचारिक आदान-प्रदान हुआ। महेश पंचाल माही ने दोहे, कविता और गीत - हम सूर्य सम रोशन रहें, तम को सदा दल ते रहें, माँ शारदे है प्रार्थना तू, शक्ति संबल ज्ञान दे प्रस्तुत किया। वक्ताओं ने बताया कि मां, माटी और मातृभाषा से प्रेम कभी भुलाया नहीं जा सकता। ये सब देशों की सीमाओं, संस्कृतियों और भौगोलिक दूरियों से परे हैं

और साहित्य इस प्रेम में सेतु की तरह कार्य करता है। उदयपुर का प्रतिनिधित्व करते हुए विख्यात मंचीय कवयित्री दीपिका माही ने राजस्थानी मायड़ भाषा की सौंधी महक को लाजवाब दोहों और हिंदी गीत- मीन की प्यास से था कोई बेखबर, एक लहर चल पड़ी पर अधूरा सफर प्रस्तुत कर कार्यक्रम का सुंदर आगाज किया। ऋषभदेव राजस्थान के कवि नरेंद्र पाल जैन ने शृंगार रस में मधुर गीत का पाठ किया। डॉ श्वेता दीप्ति ने मातृ

भूमि को समर्पित अपनी रचना सुनाई वहीं जोधपुर के वीर रस के प्रसिद्ध कवि आकाश नौरंगी ने मन की अपनी सीमाएं है, मन से आगे कैसे जाँऊ। जब अंगार भरा ह्रदय है, प्रेम गीत कैसे दोहराऊं सुना कर ख़ूब वाहवाही लूटी कार्यक्रम में कोरोना संक्रमण से बचने के लिए मास्क के उपयोग और सोश्यल डिस्टेंसिंग पर लोगों को जागरूक करने का संकल्प लिया गया।



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