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कोरोना के डर से यात्री नहीं मिल रहे, 39 ट्रांसपोर्टर ने सरेंडर कर दिए अपने परमिट

लॉकडाउन से लेकर अनलॉक के बाद भी वाहनों को सवारी और माल ढुलाई के काम नहीं मिल रहे हैं। ऊपर से टैक्स का बोझ अलग से उठाना पड़ रहा है। इससे बचने के लिए जिले के ज्यादातर बस संचालकों ने परिवहन विभाग को अपना परमिट सरेंडर कर दिया है। अभी सिर्फ 5 प्रतिशत बसें ही सड़कों पर दौड़ रही है, रूट पर ट्रेन भी कम है, लंबी दूरी की ट्रेनें जो चल रही है। उनमें भी रिजर्वेशन अनिवार्य है, लोकल गाड़ियां चल नहीं रही है, इसलिए लोगों को यात्रा करने में परेशानी हो रही है।

दीपावली के बाद बड़े बस संचालक बचे परमिट से अलग-अलग रूटों पर बस चला रहे हैं, लेकिन यात्रियों की संख्या कम होने से अभी भी उनके बस के डीजल का खर्च नहीं निकल रहा है। जिले के विशाल भारत बस सर्विस के मालिक विजय नथानी बताते है कि ऐसे में ट्रांसपोर्टर फिलहाल अपने परमिट वापस लेने के मूड में नहीं है। अभी जिले में सिर्फ 5 प्रतिशत बसें ही विभिन्न रूटों पर दौड़ रही है। बस संचालक आय कम होने से और बसें शुरू नहीं करेंगे।

फिलहाल उन्होंने अभी सिर्फ 60 दिन के लिए अपने परमिट सरेंडर किए हैं। यदि परिवहन सेवा सामान्य नहीं हुए, तो वे परमिट अगले दो महीने के लिए फिर से सरेंडर कर देंगे। फिलहाल संचालकों के साथ दूसरे कमर्शियल ट्रांसपोर्टरों की भी हालत बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है।

सिर्फ जनशताब्दी और लिंक ट्रेन ही चल रही

जांजगीर नैला स्टेशन में गिन चुने ट्रेनों का ठहराव है। इसमें मुख्य रूप से जनशताब्दी, अहमदाबाद, कोरबा विशाखापट्टनम लिंक एक्सप्रेस, साप्ताहिक कोरबा त्रिवेंद्रम, वेनगंगा शामिल है, पर कंफर्म टिकट सिर्फ जनशताब्दी और लिंक एक्सप्रेस की ही मिल रही है। अहमदाबाद एक्सप्रेस में 4 से 6 सौ वेटिंग, तो अन्य ट्रेनों में दो ढाई सौ लोग वेटिंग टिकट के साथ कतार में है।

बसें इतनी कम कि घंटों करना पड़ रहा इंतजार

जिला मुख्यालय जांजगीर से कोरबा, शिवरीनारायण, जशपुर, शिवरीनारायण, चांपा, केरा, अकलतरा सहित अन्य स्थानों के लिए बसें चलती हैं। बसें चलने का दावा तो किया जा रहा है, पर टाइम टेबल नहीं है। संख्या इतनी कम हो गई है कि दैनिक भास्कर के रिपोर्टर ने दोपहर 12 बजे से लेकर दोपहर 2 बजे तक जांजगीर के विभिन्न सड़कों पर बसें चलती हुई तलाश की पर बसें दौड़ती हुई नहीं मिली।

हर महीने सवा दो से तीन लाख रुपए का नुकसान

ट्रांसपोर्टरों द्वारा परमिट सरेंडर करने के बाद हर महीने विभाग को सवा दो सौ से सवा तीन लाख रुपए तक का नुकसान हो रहा है। परमिट सरेंडर करने वाले बस सर्विस के मालिकों से परिवहन विभाग को प्रति महीने एक बस से 6 से 8 हजार रुपए का राजस्व प्राप्त होता था। बसों का परिचालन ठप होने के परमिट शुल्क से बचने उन्होंने परमिट जमा कराया है।

दो महीने में एक बार निकालना जरूरी- परिवहन विभाग के अफसर बताते है कि बसों की सवारी कम होने से 90 फीसदी ट्रांसपोर्टरों ने अपने परमिट सरेंडर कर दिए हैं। दो महीने के बाद उन्हें परमिट आई फार्म जमा कर वापस लेना पड़ेगा।

इन ट्रांसपोर्टरों ने किए परमिट सरेंडर

राणा बस सर्विस
विशाल भारत बस सर्विस
शिव बस सर्विस
अग्रवाल ट्रांसपोर्ट
राजधानी बस सर्विस
शुक्ला बस सर्विस

दूरी के हिसाब से टैक्स- ट्रांसपोटर्स बताते है कि परमिट वाहन की दूरी और सीटों के अनुरूप तय है। सौ किमी तक 15 सीट के लिए 2000 हजार रुपए प्रति माह, 21 से 25 सीट तक के लिए 35 सौ रुपए। वहीं 51 से 56 सीटर बसों के लिए यह 30 हजार से 32 हजार तय है।

39 ने परमिट सरेंडर किया: डीटीओ

^परमिट देने का अधिकार हमें नहीं है, पर कोविड के बाद बस संचालकों ने 39 गाड़ियों का परमिट जमा किया है। परिस्थितियां सामान्य होने के बाद वे अपना परमिट वापस ले सकते हैं।''
यशवंत कुमार यादव , जिला परिवहन अधिकारी



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बिलासपुर-शिवरीनारायण के बीच खाली बस।


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