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स्नान-दान से शुरू होगा देवताओं का दिन, घरों में घुलेगी तिल-गुड़ की मिठास, पतंगों से रंगीन होगा आसमान

सूर्य 14 जनवरी से उत्तरायण हो रहे हैं। मान्यता है कि सौरमंडल का एक वर्ष देवलोक का एक दिन होता है। इस हिसाब से 6 माह देवताओं की रात होती है ताे 6 माह दिन। मकर संक्रांति के साथ देवताओं का दिन शुरू हो जाएगा। समाजों में इसका उत्सव अलग-अलग तरीके से मनाया जाएगा, लेकिन नदी-तालाब में स्नान और जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा लगभग सभी समाज में निभाई जाएगी।

गुजराती समाज - पूजा-पाठ कर उड़ाएंगे पतंग
गुजराती समाज में पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। गुजराती ब्रह्म समाज के अध्यक्ष कीर्ति व्यास बताते हैं, गुजराती समाज में संक्रांति के दिन पूजा-पाठ, तिल-गुड़ खाने के अलावा पतंग उड़ाने की परंपरा है। सामाजिक स्तर पर कार्यक्रम होंगे, परिवार मेें भी पर्व बड़े धूम से मनाया जाएगा। मान्यता है कि इस दिन पतंग उड़ाने और दूसरों की पतंग काटने से दुश्मनों का नाश होता है।

तमिल-तेलुगु समाज - 4 दिन तक पोंगल मनाएंगे
तमिल और तेलुगु समाज में इस दिन पोंगल मनाया जाता है। के लक्ष्मी बताती हैं कि यह पर्व 4 दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन बोगी पोंगल, दूसरे दिन सूर्या पोंगल, तीसरे दिन मट्‌टू पोंगल और चौथे दिन कनूमा पोंगल मनाया जाता है। बोगी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि के बाद होली जलाई जाती है और शाम को नन्हें बच्चों पर फल-फूल न्यौछावर किया जाता है।

पंजाबी समाज - लकड़ियां जलाकर मनाएंगे लोहड़ी
पंजाबी समाज इस दिन लोहड़ी मनाता है। पंजाबी सनातन सभा के अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता ने बताया, मकर संक्रांति के दिन से माघ माह शुरू हो जाता है। इस दिन लकड़ियों का अंबार लगाकर आग जलाई जाती है। उसमें गुड़, तिल, मूंगफली समर्पित की जाती है। सभा की ओर से लोहड़ी मिलन का कार्यक्रम 17 जनवरी को जोरा स्थित पंजाब केसरी भवन में रखा गया है।

मराठी समाज - महिलाएं लगाएंगी हल्दी-कुमकुम
मराठा युवा मंच के उपाध्यक्ष अविनाश शिर्के ने बताया कि मराठी समाज में मकर संक्रांति को हल्दी-कुमकुम पर्व के नाम से जाना जाता है। इस दिन समाज की महिलाएं हल्दी और कुमकुम लेकर एक-दूसरे के घर जाएंगी। तिलक लगाकर गुड़ और तिल के लड्डू बांटने की परंपरा है। अखंड सुहाग की कामना से महिलाएं एक-दूसरे को शृंगार सामग्री भी दान करती हैं।

मैथिल समाज - वर-वधु पक्ष में भेंट करेंगे भार
मैथिल ब्राह्मण समाज के सचिव नितिन कुमार झा बताते हैं कि मैथिल समाज में इस दिन सुबह स्नान के बाद भगवान को तिल अर्पित करने की परंपरा है। एक रात पहले पकवान बनाए जाते हैं। इस दिन बुजुर्ग छोटों को तिल-गुड़ बांटते हैं। थिला समाज में जिनके घर में नई शादी हुई होती है, वे एक-दूसरे को भार भेंट करने की परंपरा भी निभाते हैं।

मारवाड़ी समाज - तेरह सुहागिनों को देंगे दान
मारवाड़ी समाज मकर संक्रांति पर भगवान को तिल का भोग लगाएगा। मारवाड़ी युवा मंच के मीडिया प्रभारी हेमंत तिवारी ने बताया कि 13 जनवरी की रात से ही पर्व शुरू हो जाएगा। घरों में दाल की पकौड़ियां और पुए बनेंगे। 13 सुहागिनों को सुहाग से जुड़ी 14 चीजें भेंट करने की भी परंपरा है जो मारवाड़ी समाज के सभी घरों में निभाई जाती है।

बंगाली समाज - घर-घर होगी तुलसी की पूजा
बंगाली समाज में संक्रांति की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। मोनी दत्ता ने बताया कि 14 जनवरी की सुबह तुलसी चौरे की सफाई करेंगे। नहा-धोकर तुलसी के सामने नए चावल के आटे और नए गुड़ से सूर्य भगवान को अल्पना देंगे। नए चावल से पीठे बनाए जाएंगे। इनमें पाटीशाप्टा, पुली, पायस, दूध पुली और मूंगफली के पीठे खास हैं।

राजपूत समाज - घर-घर बनाई जाएगी खिचड़ी
उत्तरप्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति को खिचड़ी कहा जाता है। क्षत्रिय महासभा के प्रदेश संगठन मंत्री राजेश सिंह बताते हैं कि इस दिन समाज के लोग स्नान के बाद खिचड़ी बनाएंगे। इसे पास-पड़ोस के घरों में बांटा जाएगा। घरों में दही-चूड़ा, तिल के पकवान बनेंगे। खिचड़ी रात में बनाई जाएगी। आम दिनों में बनने वाली खिचड़ी से यह खिचड़ी खास होती है।



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फाइल फोटो।


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