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डेढ़ दशक में 80 हजार से ज्यादा किसानों ने छोड़ दी खेती

नीति आयोग ने बस्तर जिले को आकांक्षी जिलों में शामिल किया है। इसमें अलग-अलग सेक्टरों में काम भी किए जा रहे हैं, लेकिन कृषि एवं जल संसाधन इकाई में बस्तर जिला लगातार पिछड़ता चला जा रहा है।
जून के महीने में जारी बस्तर जिले की ओवरऑल रैंकिंग 66 पर पहुंच गई है, वहीं कृषि और जल संसाधन सेक्टर में रैंकिंग 69 पर आ गई है। मिली जानकारी के अनुसार बीते करीब डेढ़ दशक में 80 हजार से ज्यादा किसानों ने खेती-किसानी छोड़ दी है। इन हालातों में रैंकिंग घटते क्रम पर है। आंकड़े बताते हैं कि साल 2001 में हुई जनगणना में जहां खेती करने वाले किसान 42.88 प्रतिशत थे, लेकिन साल 2017 में हुई आर्थिक जनगणना में यह प्रतिशत गिरकर 30.38 पर पहुंच गया। इस साल जनवरी के महीने में जारी आकांक्षी जिलों की रैंकिंग में कृषि के सेक्टर में बस्तर जिले को 25.1 प्रतिशत अंक मिले थे, जो फरवरी में बढ़कर 25.4 हो गया, लेकिन जून के महीने में बस्तर जिले का प्रतिशत 20.7 पर आ गया।

योजनाओं का लाभ नहीं इसलिए छोड़ रहे खेती
खेती-किसानी को बढ़ावा देने को लेकर जहां सरकार तमाम योजनाएं चला रही हैं, वहीं वास्तविक रूप से इनका लाभ बस्तर के आदिवासी किसानों को नहीं मिल पा रहा है। यही कारण है कि खेती-किसानी छोड़कर अब वे अपने ही खेत को अधिया में देकर इसकी देखभाल करने के नाम पर मजदूरी कर रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि खेती के लिए पर्याप्त संसाधन किसानों को नहीं मिल पा रहे हैं।

बस्तर जिले में अपनी जमीन अधिया में देकर खुद कर रहे मजदूरी, क्योंकि खाद-बीज के दाम बढ़े
बस्तर जिले में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं, जो अपनी जमीन अधिया में देकर खुद ही उसमें मजदूरी कर रहे हैं। जबकि एक समय ये भी था कि वे अपने खेत में फसल लेते थे और इन्हें बेचते थे। शहर से लगे ग्राम जाटम के किसान गुरुदेव बताते हैं कि अब खेती-किसानी में वो फायदा नहीं रहा, जो पहले मिलता था। खाद-बीज सब महंगे हो गए हैं। ऐसे में लंबे समय तक खेत के खाली रहने के बाद शहर के प्रसून कुमार को जमीन दे दी, जिसमें वे सब्जियां उगा रहे हैं। साल में तय 25 हजार रुपए की रकम उन्हें मिल जाती है। इसके अलावा मजदूरी करने पर जो मेहनताना बनता है, वो अलग से कमा लेते हैं। ऐसे ही कई और भी किसान हैं, जो अपनी जमीन दूसरों को दे चुके हैं। बस्तर के किसानों को योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा। इस कारण खेती करना छोड़ रहे है।

दूसरे के खेतों में काम कर रहे 1.87 लाख आदिवासी
खेती-किसानी करने वालों की कम होती संख्या के बीच दूसरे के खेतों में काम करने वाले किसानों की संख्या में करीब 16 प्रतिशत ईजाफा हुआ है। साल 2001 में जहां दूसरे के खेतों में काम करने वाले 31.48 प्रतिशत किसान थे, जबकि साल 2017 में हुई आर्थिक जनगणना में इस बात का खुलासा हुआ कि 17 सालों में ये बढ़कर 46.79 प्रतिशत तक पहुंच गया। आंकड़ों के मुताबिक पहले 154990 आदिवासी किसान खेती करते थे, वहीं इस साल ये संख्या घटकर 121591 रह गई है। 113758 आदिवासी किसान दूसरे के खेतों में काम कर रहे थे, जो इस साल 187291 हो चुके हैं।



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