मक्के की तरह हर मौसम में बोया जा सकेगा चना,बांसवाड़ा के वैज्ञानिकों ने चना सुधार परियोजना के तहत अनुसंधान कर विकसित की नई किस्म पीसीबी
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित संभागीय कृषि अनुसंधान केंद्र बोरवट बांसवाड़ा के वैज्ञानिकों ने अखिल भारतीय चना सुधार परियोजना के तहत चने की नई किस्में इजाद की हैं। जिनकी किसी भी मौसम में बुवाई कर उनसे चने की अच्छी फसल पैदावार प्राप्त की जा सकती है।
संभागीय कृषि अनुसंधान केंद्र बोरवट बांसवाड़ा के संभागीय निदेशक कृषि अनुसंधान डॉ. प्रमोद रोकड़िया ने बताया कि अनुसंधान केंद्र पर वर्ष 2015 से संचालित अखिल भारतीय चना सुधार परियोजना का उद्देश्य वागड़ अंचल के किसानों के लिए उच्च गुणवत्ता वाला चना बीज उपलब्ध करवा कर अधिक उपज देने वाले बीजों का अनुमोदन यहां की जलवायु के हिसाब से करना है।
उन्होंने बताया कि वागड़ अंचल के किसानों को जल्दी पकने वाली किस्में चाहिए, क्योंकि फरवरी के बाद यहां पर तापमान में अचानक बढ़ोतरी होती है और फसल जल्दी पक जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए परियोजना के प्रभारी डॉ. देवेंद्र पाल सैनी ने चने की तीन किस्मों प्रताप बांसवाड़ा चना 501, प्रताप बांसवाड़ा चना 503, प्रताप बांसवाड़ा चना 505 का अनुसंधान कर विकास किया है।
इन किस्मों का परीक्षण राष्ट्रीय स्तर पर अाैर ग्राह्य अनुसंधान केंद्र चित्तौड़ पर उचित पाया गया है। इन किस्मों में प्रताप बांसवाड़ा चना किस्म 501 देरी से बुवाई के लिए उपयुक्त है। वहीं प्रताप बांसवाड़ा चना 503 देरी से बुवाई के लिए और प्रताप बांसवाड़ा चना असिंचित क्षेत्रों में बुवाई के लिए नहरी तंत्र के अंतिम छोर के खेतों में बुवाई के लिए उपयुक्त पाई गई है। डॉ. देवेंद्र पाल सैनी ने बताया कि चने की इन तीनों किस्मों को राज्य स्तरीय अनुमोदन कमेटी को प्रस्तावित कर संभाग के लिए उपलब्ध करवाना प्रमुख उद्देश्य है।
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