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राजधानी में 40 ई-टायलेट बनाने थे, केवल 11 ही बने वो भी काम के नहीं क्योंकि दो साल में चार्ज ही तय नहीं

राजधानी रायपुर में मेट्रोपोलिटन शहरों का फील लाने के लिए रायपुर स्मार्ट सिटी ने करीब ढाई साल पहले शहर में 40 जगह पर ई-टायलेट बनाने की योजना पर काम शुरू किया। शुरुआत में जिस कंपनी को काम दिया गया, वह 5 टायलेट बनाकर गायब हो गई। इसके बाद आई दूसरी कंपनी ने 6 और बनाए। वह भी पहली कंपनी की तरह पेमेंट लेकर चली गई और योजना 11 ई-टायलेट में ही सिमट गई। सालभर से 72 लाख रुपए की लागत वाले ये टायलेट अंबेडकर अस्पताल के सामने, रविवि परिसर समेत कई जगह खड़े-खड़े कंडम हो गए। सभी टायलेट पे एंड यूज हैं। सिक्के डालने पर उसका उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इन्हें इसलिए नहीं खोला जा सका, क्योंकि स्मार्ट सिटी इसके संचालन के लिए कोई एजेंसी ही नियुक्त नहीं कर पाई है।
यही नहीं, स्मार्ट सिटी दो साल में यही तय नहीं कर सकी है कि लोगों को ई-टायलेट उपयोग के लिए कितना भुगतान करना पड़ेगा। इस वजह से भी सभी जगह के टायलेट बंद पड़े हुए हैं। बंद होने के कारण लोग उसके आसपास गंदगी करने लगे थे। इसलिए स्मार्ट सिटी ने बीच में खुली जगह पर दीवार इत्यादि खड़ी कर उसे सुरक्षित करने की कोशिश की, लेकिन अब बिना उपयोग के सभी टायलेट खराब हो रहे हैं। जबकि एक ई-टॉयलेट बनाने में लगभग साढ़े 6 लाख रुपए की लागत आई है। 40 ई-टॉयलेट शहर के ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर बनाए जाने थे, जहां लोग किसी न किसी काम आते हैं। उनमें अस्पताल और सरकारी कार्यालय शामिल हैं। पूरी योजना लगभग पौने 3 करोड़ रुपए की थी, लेकिन अब लगभग डिब्बाबंद हो चुकी है।

पेमेंट लेकर गईं कंपनियां
स्मार्ट सिटी ने योजना बनाने के बाद ई-टॉयलेट के निर्माण के लिए दो बार ठेके किए। बेंगलुरू की कंपनी ने पहली बार सभी 40 ई-टायलेट बनाने का ठेका लिया। एक साल से ज्यादा वक्त तक ये कंपनी शहर में रही और केवल 5 ही टॉयलेट बना सकी। अंबेडकर अस्पताल के सामने टॉयलेट इसी कंपनी ने बनाया था। उसके महीनों बाद केरल की एक और कंपनी को इस काम के लिए चुना गया। उसने 6 नई जगहों पर टॉयलेट बनाए, लेकिन वो भी टेस्टिंग में उलझ गई। इस तरह बीते डेढ़ दो साल में 11 जगह टॉयलेट के ढांचे ऐसे ही खड़े हैं।

इसके मॉडल में ही खामी
जानकारों का दावा है कि सभी ई-टायलेट के मॉडल में ही खामी है। इसके इस्तेमाल करने पर गंदगी ही फैलेगी। इसकी डिजाइन और ई-टॉयलेट की चौड़ाई कम है। दरवाजे खोलने में ही अधिकारियों की सांसे फूंलने लगी हैं। ई-टॉयलेट की उपयोगिता प्रमाण पत्र देने के लिए तकनीकी विभाग के इंजीनियरों ने इसकी टेस्टिंग में ही फेल कर दिया। इसमें पेंच फंसते ही कंपनियों ने अपना बकाया भुगतान करा लिया और गुपचुप तरीके से बोरिया बिस्तर बांध कर भाग खड़ी हुईं। इसलिए ये ई-टॉयलेट अब सिर्फ शो-पीस बनकर शहर के व्यस्ततम आंबेडकर और पं. रविशंकर के चौराहों पर जगह घेरकर खड़े हैं। इधर से गुजरने वालों को इसके शौचालय होने का अहसास भी नहीं होता है।

अफसरों से जानकारी मांगी
"स्मार्ट सिटी के अफसरों से जानकारी मांगी है कि 40 जगह की ई-टायलेट योजना 11 जगहों में कैसे सिमट गई। बंद टायलेट को लेकर भी अफसरों से जवाब लिया जाएगा और दोषियों पर कार्रवाई होगी।" -एजाज ढेबर, महापौर रायपुर



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40 e-toilets were to be built in the capital, only 11 were made, that too was not useful because the charge was not fixed in two years.


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