हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल बने भेजामैदानी गांव में भाईदूज के दिन दीपावली मनाएंगे ग्रामीण
जिले में दो गांव ऐसे हैं जहां एक दिन बाद यानि गोवर्धन पूजा के दिन दीपावली मनाई जाती है अाैर भाईदूज के दिन गाेवर्धन पूजा करते हैं। गुरुर ब्लाॅक के ग्राम भेजामैदानी व डौंडीलोहारा ब्लाॅक के ग्राम लमती के लोग कार्तिक अमावस्या के दिन दीपावली न मनाकर उसके दूसरे दिन मनाएंगे। वहीं गोवर्धन पूजा भाईदूज के दिन मनाएंगे। दोनों गांव में दीपावली एक दिन बाद मनाने के बारे में कोई विशेष कारण तो नहीं है। उस समय पूर्वजों ने जाे किया उसे यहां के लाेग उसे परंपरा बना लिए हैं। इन गांवों की दीपावली एक दिन बाद मनाने की परंपरा कई साल से चली आ रही है।
गुरुर ब्लाॅक मुख्यालय से 6 किमी की दूरी पर धमतरी-बालोद मुख्य मार्ग पर बसे भेजामैदानी गांव की जनसंख्या करीब दो हजार है। यहां की दीवाली हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल है। भेजामैदानी में सभी वर्ग व जाति के लोग निवास करते हैं और उनमें भाईचारे की भावना है। यहां हर त्योहार मिलकर मनाते हैं। काेराेना के बाद भी लाेगाें में उत्साह है। लेकिन सावधानी बरतते हुए त्याेहार मनाने का निर्णय ग्रामीणाें ने लिया है। अखाड़ा दल ने तैयारी पूरी कर ली है।
इस बार काेराेना वायरस के चलते सावधानी बरतते हुए त्याेहार मनाने की तैयारी शुरू
रेखराम यादव, खोरबाहरा राम,असरफ अली, इंद्रसेन गजेन्द्र, पंचूराम ने बताया कि भेजामैदानी ब्रिटिश शासनकाल में धमतरी के मालगुजार रामभरोसा के अधीन था। मालगुजार रामभरोसा की जमींदारी धमतरी के साथ-साथ भेजा मैदानी में भी था। पहले वह धमतरी में पंचांग के अनुसार दीपावली मनाते थे। जिसके बाद दूसरे दिन भेजामैदानी में त्योहार मनाने के लिए आते थे। मालगुजार ने जो परंपरा बनाई थी। उसके अनुसार यहां के ग्रामीण आज भी एक दिन बाद दीपावली मनाएंगे। इस बार काेराेना वायरस के संक्रमण चलते सावधानी बरतते हुए त्याेहार मनाएंगे।
बाजे-गाजे के साथ निकालते हैं गौरा-गौरी की बारात
ग्राम भेजामैदानी के दीपावली व गोवर्धन पूजा काे देखने दूरदराज के लाेग भी आते हैं। लोग स्थानीय बोली में भेजा देवारी के नाम से जानते हैं। कार्तिक शुक्ल पक्ष एक को जब सभी जगह गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दिन यहां दीपावली मनाई जाती है। रात में गौरा-गौरी की बारात पारंपरिक बाजे-गाजे के साथ निकाली जाती है। इसके दूसरे दिन भाईदूज को गोवर्धन पूजा होती है। गांव के साहड़ा देव के पास सामूहिक रूप से गाेवर्धन की पूजा की जाती है। इस दौरान गांव भर के लोग एकत्र होते हैं।
गाड़ा बाजा की धुन पर ही डांग डोरी निकालते हैं लोग
डाैंडीलाेहारा ब्लाॅक के ग्राम लमती में गाड़ा बाजा के साथ गौरा-गौरी की पूजा की जाती है। इसके बिना रस्म अधूरी है। बाजे की धुन पर महिलाएं गौरा-गौरी गीत गाती है। पूरे गांव का भ्रमण कर गौरा चौक पहुंचती है। गोवर्धन पूजा के एक दिन पहले रैनी उतारने की परंपरा निभाई जाती है। गोवर्धन पूजा में देवी-देवता एकत्रित होते हैं। गाड़ा बाजा की धुन पर ग्रामीण डांग डोरी निकालते हैं।
ग्राम लमती में 19 वीं सदी से चली आ रही यह परंपरा
गांव के रमनलाल धनेंद्र ने बताया कि 19वीं सदी से यह परंपरा चली आ रही है। जब से गाड़ा बाजा नहीं होने से कई समस्याओं का सामना करना पड़ा, तब से लमती में एक दिन बाद गोवर्धन पूजा व लक्ष्मी पूजा का दौर चल रहा है। गाड़ा बाजा के बिना दीपावली अधूरी है। गौरा-गौरी को जगाने से लेकर विसर्जन तक गाड़ा बाजा महत्वपूर्ण होता है। लोग बाजा की आवाज में ही गौरा-गौरी का सुमिरन करते हैं।
धान की बालियां, मेमरी फूल से बनाया जाता है गोवर्धन
गांव के चौक के पास गोबर, धान की बालियां, मेमरी के फूल लगाकर गोवर्धन बनाया जाता है। इसके बाद गांव के बैगा और राउत समाज द्वारा सामूहिक पूजा किया जाता है। फिर गांव के जितने मवेशी है, उन्हें बनाए गए गोवर्धन से पार कराया जाता है। गांव में मेला लगता है।
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