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पीड़ितों का दर्द- नक्सली प्रताड़ना से पिता ने फांसी लगा की खुदकुशी, 25 परिवारों को छोड़ना पड़ा गांव

मैं हूंगा मंडावी गुमियापाल गांव का हूं। 5 भाई हैं, एक पुलिस में शामिल हुआ तो नक्सली हर दिन प्रताड़ित करने लगे। कभी दौड़ा- दौड़ा कर मारते तो कभी जन अदालत में मारने की धमकी देते। हर दिन नक्सलियों की इस पिटाई से तंग आकर पिता ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। नक्सलियों ने गांव छोड़ने मजबूर कर दिया। मैं हांदावाड़ा का अविनाश कश्यप हूं। हम अपने गांव में ही चैन की सांस नहीं ले पा रहे। हर रात नक्सली घर आकर तंग करते थे। मजबूरन 25 परिवारों को गांव छोड़ना पड़ा। मैं मड़कामी रास की भीमे मड़काम हूं। पति मिट्ठू निर्दोष थे, जिनकी नक्सलियों ने बेरहमी से हत्या कर दी।
ऐसा ही दर्द एक- दो नहीं बल्कि नक्सलियों की दी गई पीड़ा झेल रहे कई ग्रामीणों ने गुरुवार को सभी को सुनाया। यह मौका था विश्व मानवाधिकार दिवस के मौके पर आयोजित संगोष्ठी का। जब पहली बार नक्सल पीड़ित परिवारों, सरेंडर नक्सलियों को खुलकर अपनी बात रखने मंच मिला। यहां बेझिझक होकर सभी ने खुद पर हुए अत्याचारों को बताया व शासन-प्रशासन से राहत दिलाने की मांग की। पहली बार हुई इस संगोष्ठी में अफसर, मीडिया के अलावा पीड़ित ग्रामीणों को भी वक्ता बनाया गया। ग्रामीणों के दर्द को सुन सभी भावुक हो गए। इस मौके पर सीआरपीएफ डीआईजी विनय कुमार सिंह, कलेक्टर दीपक सोनी, एसपी डॉ. अभिषेक पल्लव, एएसपी उदय किरण, राजेन्द्र जायसवाल, एसडीओपी चंद्रकांत गवर्णा, डीएसपी अमर सिदार, आशा रानी, टीआई गोविंद साहू, अजय अन्य मौजूद थे।

कलेक्टर बोले- सरेंडर करते ही अधिकार मिल रहे प्रस्ताव मंगाया गया है, अभी और भी काम होंगे
संगोष्ठी में कलेक्टर दीपक सोनी ने कहा कि शासन की कई महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं, जिसका लाभ लेना आपका अधिकार है। इसे समझें और लाभ लें। सरेंडर करते ही मांग पर बड़े गुडरा में ट्रैक्टर मिला, भांसी में स्कूल भवन की स्वीकृति मिली, गोधन न्याय योजना की ट्रेनिंग करवाकर महीनेभर के अंदर शेड बनवाए। आगे भी बहुत सारे काम होंगे। सभी मिलकर गोली नहीं बल्कि विकास से नक्सलवाद का खात्मा करेंगे। नक्सल पीड़ित परिवारों की जो भी मांगें हैं उनका प्रस्ताव बनाकर पुलिस विभाग से मंगाया गया है। एक हफ्ते के अंदर यह काम करेंगे।

नहीं पहुंचीं सामाजिक कार्यकर्ता बेला व सोनी
आदिवासियों के लिए उनके अधिकारों की अक्सर लड़ाई लड़ने वालीं समाज सेविका सोनी सोरी व बेला भाटिया को भी इस संगोष्ठी में वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था, लेकिन ये दोनों इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचीं। एसपी ने बताया कि मुख्य वक्ता के रूप में इन्हें भी आमंत्रित किया गया था।

नक्सली जीने नहीं दे रहे हैं क्या यही मानवाधिकार है?
एसपी डॉ. अभिषेक पल्लव ने कहा कि मानव अधिकार की बात करने वाले नक्सली अंदरूनी गांवों में ग्रामीणों को उनकी मर्जी से सांस नहीं लेने देते, उनकी इच्छा के मुताबिक काम नहीं करने देते। निर्दोषों की बेरहमी से नक्सली पिटाई करते हैं, चींटियों से कटवाते हैं, उनका राशन, सामान सब कुछ लूटते हैं, क्या यही मानवाधिकार है? नक्सलवाद पनपने का कारण भी एसपी ने पुलिस व फारेस्ट विभाग की कमजोरी बताई। उन्होंने पुलिस जवानों को भी आगाह किया कि ग्रामीणों के साथ हमेशा संवेदनशीलता से पेश आएं। ऐसा किसी भी तरह का कृत्य न करें जिससे उनके अधिकारों का हनन हो। अब तक दिल्ली में बैठकर लोग मानवाधिकार की बात करते हैं। धरातल पर आकर सच्चाई जानें, पीड़ितों से मिलें और समझें कि उनके अधिकार कैसे नक्सली छिन रहे हैं। इस मौके पर डीआईजी विनय सिंह, ज़िला पंचायत सीईओ अश्वनी देवांगन, वरिष्ठ पत्रकार विनोद सिंह ने भी ग्रामीणों को संबोधित किया।



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The pain of the victims - father hanged himself due to Naxalite torture, 25 families had to leave the village


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