संबलपुर में 250 साल पहले मुस्लिम परिवार ने पोला पर शुरू की बैल दौड़; कोरोना भी नहीं रोक पाया
सुमंत सिन्हा | संबलपुर में प्रति वर्ष पोला पर्व पर बैल दौड़ का आयोजन होता है। सालों से यहां हो रही बैल दौड़ जितनी लोकप्रिय है, इसका इतिहास उससे कहीं अधिक रोमांचक और सामाजिक सद्भावना की मिसाल है। 250 साल पहले संबलपुर के एक मुस्लिम परिवार ने पोला पर बैल दौड़ की परंपरा शुरू की थी। प्रतिभागी बैलों को खिचड़ी खिलाते थे तथा उनके मालिक को धोती देते थे।
फायरिंग के साथ शुरू होती है दौड़ : वर्तमान में बैलदौड़ पुरानी पानी टंकी से गणेश मंदिर 300 मीटर होती है। प्रतिभागी बैलों को खिचड़ी खिलाने, पूजा अर्चना करने के बाद तीन हवाई फायरिंग के साथ दौड़ शुरू होती है।
पहले बैलगाड़ी दौड़ होती थी, अब बैल दौड़ते हैं
उस परिवार के चौथी पीढ़ी के 81 वर्षीय मो. अब्दुल नईम ने इसकी पुष्टि करते बताया उनका परिवार महाराष्ट्र से यहां आकर बसा। महाराष्ट्र में पोला पर बैलगाड़ी दौड़ होती है। हमारे पूर्वज शेख फरीद ने संबलपुर में उसमें थोड़ी तब्दीली करते बैलगाड़ी की जगह बैल दौड़ कराया। तब बैलों को पंचायत भवन से हमारे घर तक दौड़ाया जाता था।
बैलदौड़ के अलावा कबड्डी सुआ प्रतियोगिता होती थी
संबलपुर में हर वर्ष यहां पोला पर बैलदौड़ के अलावा कबड्डी, सुआ नृत्य प्रतियोगिता भी होती थी। इस वर्ष कोरोना के कारण कबड्डी, सुआ नृत्य प्रतियोगिता नहीं हुई लेकिन बैलदौड़ की लोकप्रियता इतनी अधिक है की कोरोना भी इसे रोक नहीं पाया।
इस बार दौड़ में देवेंद्र का बैल रहा अव्वल
ग्रामीणों ने बताया पहले गांव के रामरतन रजक का बैल हमेशा जीतता था। उनके बाद कैलाश यादव, संतलाल कवलिया के बैल लगातार जीतते रहे। इस वर्ष प्रथम देवेंद्र जांगड़े का बैल, द्वितीय टिकू कोसमा का बैल तथा तृतीय थामेश्वर रावटे का बैल रहा।
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