बांसुरी अंदर से खाली है पर सच्चे हृदय का प्रतीक है
पाटेश्वधाम में चल रहे वाट्सएप सत्संग में संत रामबालक दास ने कृष्ण प्रिया राधा रानी के रूप चरित्र का गुणगान करते हुए बताया कि राधा अष्टमी का दिन अद्भुत है। एक बार रास बिहार स्थली पर कृष्ण विराजमान होते हैं, और उनके बाएं भाग पर राधारानी विराजित है। दिव्य छवि जिसका दर्शन कर तीनों लोक अभिभूत हो जाते हैं, उसे देख नारद जी भी दर्शन को आतुर हो वहां पहुंचे और उनके अद्भुत रूप को प्रणाम कर उनके चरणों में पड़ कर उनसे हाथ जोड़कर बोले, प्रभु आपका यह स्वरूप आने वाले कलयुग को भी प्रभावित करेगा। जब पवित्र प्रेम निस्वार्थ प्रेम का अभाव होगा। वहां आप दोनों के प्रेम को याद करके लोग प्रेम की परिभाषा को समझेंगे, लेकिन आप दोनों की प्रेम के बीच में एक छोटी सी बात समझ नहीं आती, उस रहस्य को जानने की जिज्ञासा है।
भगवान कृष्ण मुस्कुराए और उनसे उस रहस्य को उद्धृत करने को कहा। तब नारद बोले, प्रभु बांसुरी के कारण आपकी छवि बढ़ती है। इसके बारे में बताइए। तब कृष्ण प्रेम पूर्वक राधा रानी काे देखते हुए बोले, नारद बांसुरी प्रतीक है एक सच्चे हृदय का, निस्वार्थ प्रेम का। बंशी अंदर से खाली है, मेरा प्रिय वहीं हो सकता है। दूसरी बात बंशी में छिद्र है छल नहीं है। इसमें जो छिद्र है वह मधुर स्वर को उत्पन्न करता है, जो सबको आनंद देता है, सब के दुख को दूर करता है, इसीलिए बंशी मुझे अधिक प्रिय है।
माता ने गोबर के गणेश में ही प्राण फूंके: बाबा ने बताया कि माता पार्वती के द्वारा गाय के गोबर से गणेश के निर्मित होने की कथा मिलती है। हम गोबर के गणेश की प्रतिमा का स्थापना भी करते हैं, जो अधिक उचित लगता है। माता ने गोबर के गणेश में ही प्राण फूंके और उनको बालक रूप में जन्म दिया। कैलाश में शिव गणों में गणेश ऐसे गण हुए जो केवल माता के आज्ञाकारी हुए। शिव जो संकल्प मात्र से विनाश भी कर सकते है वे सृष्टि का निर्माण भी कर सकते हैं।
गणेश विवाह की कथा सुनाई
गणेश के विवाह प्रसंग को स्पष्ट करते हुए बाबा ने बताया कि गणेश का मुख गजमुख था और परशुराम से युद्ध में उनका एक दांत भी टूट चुका था। ऐसे में कोई भी पिता अपनी पुत्री का विवाह उनसे कैसे कर पाता। इस परेशानी में गणेश परेशान रहता था। उन्होंने अपने वाहन मूषक को बुलाया और बोले जब तक हमारा विवाह नहीं होगा। तब तक किसी का भी विवाह नहीं हो सकता। जब भी किसी देवी-देवताओं के यहां विवाह होता वह श्री गणेश के पास खबर लाते और अपनी मूषक सेना को वहां भेजकर पूरी तरह से विघ्न डाल देते। इस प्रकार गणेश विघ्नकर्ता रूप में प्रचलित हुए, तब सभी देवी देवता परेशान होकर माता पार्वती के पास गए और अपनी समस्या को उनके समक्ष रखा। तब माता मुस्कुरा कर बोली, हे देवगण मेरे भी पुत्र का उम्र विवाह योग्य हो गया है। मेरे पुत्र का विवाह हो जाता है तो उसके बाद जिनका भी विवाह होगा। सभी ने गणेश के विवाह की तैयारी शुरू की। तब ब्रह्मा के मानस पुत्री रिद्धि-सिद्धि के साथ गणेश का विवाह हुआ। तभी से गणेश का पूजन रिद्धि-सिद्धि के साथ की जाती है और उनके साथ ही उनको अपने घर में स्थापित किया जाता है।
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