10 दिन की धूप से जी उठा रामतिल, अच्छे उत्पादन की उम्मीद
बीते दस दिनों से मौसम खुला होने और धूप निकलने से रामतिल की फसल पर मंडरा रहा खतरा टल गया है। अब किसान ना सिर्फ फसल खराब होने की चिंता से मुक्त हो चुके हैं, बल्कि अन्य सालों से भी अधिक उत्पादन की उम्मीद जता रहे हैं। कृषि विभाग के मुताबिक इस वर्ष 25 हजार हेक्टेयर भूमि पर फसल लहलहा रही है, जो बीते साल की तुलना में एक हजार हेक्टेयर अधिक है।
अक्टूबर में हो रही भारी बारिश से रामतिल की फसल पर खतरा आ गया था। ज्यादा बारिश के कारण रामतिल के पौधे खेतों में सो गए थे और फूल नहीं उग पा रहे थे। शुरू से हो रही अच्छी बारिश से पौधों में ग्रोथ तो अच्छा था, पर फूल खिलने व बीज के ठोस होने के लिए मौसम खुलने और धूप पड़ने की जरूरत महसूस हो रही थी। 23 अक्टूबर तक हुई बारिश के बाद कई किसानों से उम्मीद छोड़ दी थी। पर मौसम अचानक से किसानों पर मेहरबान हुआ। किसान बिनोद राम, बिल्टू राम, बलकू और रामेश्वर राम का कहना है कि इस बार जिन किसानों ने भी रामतिल लगाया है, सभी खुश हैं। कुछ दिन पहले तक यह उम्मीद बिल्कुल नहीं थी, पर अब बीते दो सप्ताह से मौसम खुला है, तो पौधों में फूल भी तेजी से आ रहे हैं। गौरतलब है कि आदिवासी बाहुल्य जशपुर जिले सहित जशपुर सीमा से लगे झारखंड व सरगुजा संभाग के सीमावर्ती क्षेत्रों के उत्पादन को मिलाकर हर साल करीब 40 से 50 लाख डालर से अधिक के रामतिल का निर्यात होता है। बीते साल क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं थी तब इतने का कारोबार हुआ था। इस वर्ष क्वालिटी अच्छी होने के कारण 60 लाख डॉलर के कारोबार की उम्मीद है। भारत के साथ इथोपिया, बांग्लादेश, नेपाल और बर्मा में भी रामतिल की खेती की जाती है।
यूरोप व अमेरिका में होता है निर्यात
रामतिल की बुआई अगस्त माह से की जाती है और नवंबर-दिसंबर में इसके फसल को काट लिया जाता है। यहां की बालुई दोमट और पथरीली पहाड़ी ढालू का जमीन बेहद उपयुक्त है। फसल के लिए 18 से 20 डिग्री सेल्सियस का तापमान अनुकूल होता है। 30 डिग्री से अधिक तापमान होने पर इसके फूल को नुकसान पहुंचता है। जशपुर में होने वाली 1000 से 1300 मिलीमीटर वर्षा भी इसके लिए अनुकूल है। एक एकड़ में किसान को 4 से 5 क्विंटल का उत्पादन मिलता है। मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों और वर्षा की पानी के अलावा इसकी फसल को और कुछ नहीं चाहिए। इसके कारण किसानों के लिए इसकी खेती फायदे का सौदा है।
पर्यटकों को भी लुभाएगा रामतिल
जिले में इन दिनों रामतिल की फसल लहलहानी शुरू हो गई है, जिससे ऐसा नजारा दिख रहा है कि धरती ने पीली चादर ओढ़ ली है। नवंबर व दिसंबर के महीने में सन्ना, मनोरा, आस्ता, जशपुर अन्य इलाकों में खेतों में लहलहा रही रामतिल की फसल पर्यटकों को आकर्षित करती है।
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