घरों को काले रंग से ही रंगते हैं ग्रामीण, एकरूपता है वजह
घरों को रंगने के लिए पेंट बनाने वाली कंपनियां काले रंग का पेंट नहीं बनाती है। ऑयल पेंट, इमल्शन पेंट या चूना कलर किसी के भी कैटलॉग में काला रंग नहीं होता है। क्योंकि सामान्य तौर पर भी कोई भी अपने घरों की दीवार पर काला रंग नहीं चढ़ाता है। लेकिन जिले के आदिवासी बाहुल्य गांव व शहर में काले रंग से रंगे हुए मकान आसानी से नजर आते हैं। आदिवासी आज भी अपने घरों की फर्श और दीवारों को काले रंग से रंगते हैं। इसके पीछे उनकी अपनी मान्यताएं हैं।
दीपावली के पूर्व इन दिनों घरों के रंग-रोगन का काम चल रहा है और इस साल भी ग्रामीण अपनी परंपरा के अनुरूप ही काले रंग का चयन कर घरों को रंग रहे हैं। ग्रामीण घरों की दीवारों को काली मिट्टी से रंगते हैं। कुछ ग्रामीण पैरावट जलाकर काला रंग तैयार करते हैं तो कुछ टायर जलाकर भी काला रंग बनाते हैं। पहले से काली मिट्टी उपलब्ध हो जाती थी पर काली मिट्टी नहीं मिलने की स्थिति में ऐसा किया जा रहा है।
1 समाज में एकरूपता लाने के लिए - अघरिया आदिवासी समाज के अध्यक्ष रोपन राम अघरिया ने बताया कि आदिवासियों में एकरूपता हो इसलिए सभी आदिवासियोें ने घरों को काले रंग से रंगना शुरू किया। यह उस वक्त से चला आ रहा है जब आदिवासी चकाचौंध से दूर थे। घरों को रंगने के लिए उस वक्त काली मिट्टी या छुई मिट्टी ही हुआ करती थी, और इससे रंगाई कर ली जाती थी। आज भी गांव में काले रंग को देखकरपता चल जाता है कि यह किसी आदिवासी का मकान है। इस काले रंग से एकरूपता बनी हुई है।
2 घर का सदस्य ही जान पाता है किस कमरे में क्या- वनवासी कल्याण आश्रम के हित रक्षा प्रमुख रामप्रकाश पांडेय का कहना है कि काले रंग के घरों में दिन में भी इतना अंधेरा होता है कि किस कमरे मेें क्या है यह सिर्फ घर का सदस्य ही जान पाता है। आदिवासियों के घरों में खिड़की कम होते हैं। छोटे-छोटे रोशनदान होते हैं। ऐसे घरों में चोरी का खतरा कम होता है। सभी सीजन में काले रंग की मिट्टी की दीवार आरामदायक होती थी। आदिवासी दीवारों पर कई कलाकृतियां भी बनाते हैं। इसके लिए भी दीवारों पर काला रंग चढ़ाते हैं।
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