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20 साल बाद अब पीएलजीए सप्ताह नहीं वर्ष, मतलब ज्यादा हमले, ज्यादा तबाही

मोहम्मद इमरान नेवी | नक्सलियों के खिलाफ अभी केंद्र और राज्य सरकार मिलकर ऑपरेशन चला रही हैं। केंद्र और राज्यों के बीच ऑपरेशन के समन्वय के लिए विशेष सुरक्षा सलाहाकार के तौर पर के विजय कुमार की नियुक्ति की गई है और सरकारों ने लक्ष्य बनाया है कि वर्ष 2022 तक नक्सलवाद खत्म करना है। सरकार की इस नई रणनीति का असर नक्सलियों के ढांचे पर भी पड़ा है और अब नक्सलियों ने भी सरकार के इस नए ऑपरेशन के खिलाफ काम करना शुरू कर दिया है। हाल ही में नक्सलियों ने अपने 20 साल पुराने कार्यक्रम में बड़ा बदलाव किया है।
नक्सली हर साल 2 दिसंबर से 8 दिसंबर तक पीएलजीए सप्ताह (स्थापना सप्ताह) मनाते रहे हैं लेकिन अब नक्सलियों के सेंट्रल मिलिट्री कमिशन ने नया फरमान जारी किया है और अब वर्ष 2020-2021 में पूरे साल पीएलजीए सप्ताह नहीं होगा बल्कि पीएलजीए वर्ष होगा। इस बदलाव के पीछे का कारण भी नक्सलियों ने केंद्र और राज्य सरकारों के द्वारा चलाए जाने वाले ऑपरेशन समाधान को बताया गया है।
नक्सलियों की ओर से कहा गया है कि वे इस पूरे साल नई भर्तियां, चुनिंदा क्षेत्रों में जरूरत के हिसाब से बड़े हमले करेंगे। नक्सलियों ने ये भी कहा है कि उनकी ओर से अब तक 208 बड़े, 318 मध्यम और 3948 छोटे हमले किए जा चुके हैं। इन सभी हमलों से भी सीख ली जाएगी। नक्सल मामलों के जानकारों का कहना है कि अचानक ही पूरे साल सक्रिय रहने की घोषणा के पीछे नक्सलियों की बड़ी मानसिकता काम कर रही है और आने वाले दिनों में नक्सलियों का एग्रेसिव रूप में देखने को मिल सकता है। नक्सलियों के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन ने माना है कि अॉपरेशन समाधान से नुकसान हुआ है और अब निर्णायक लड़ाई का वक्त आ गया है।

जानिए, क्या होती है नक्सलियों की पीएलजीए
पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की स्थापना नक्सलियों ने 2000 में की थी। नक्सली हर साल 2 दिसंबर से 8 दिसंबर तक पीएलजीए सप्ताह मनाते रहे हैं। इस दौरान वे अपने पूरे साल का लेखा-जोखा जारी करते हैं आने वाले साल में संगठन कैसे चलेगा इसकी प्लानिंग करते है। इस दौरान नक्सली फोर्स पर हमले भी करते है।

हिंसा बढ़ेगी, ग्रामीणों को बीच में पिसना होगा
नक्सलियों की घोषणा के अनुरूप यदि वर्ष 2021 में पूरे साल पीएलजीए वर्षगांठ के तौर पर मनाया जाएगा तो बस्तर सहित देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में हिंसा बढ़ेगी। यहीं नहीं, बस्तर के परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो अंदरूनी गांव, जो नक्सल प्रभावित इलाकों में शुमार हैं, वहां फोर्स और नक्सलियों के बीच आम आदिवासी का पिसना तय है।

नक्सलियों ने माना ऑपरेशन समाधान से बड़ा नुकसान, कई रेड गोरिल्ला जोन खाली
इधर नक्सलियों के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन ने माना है कि सरकार की ओर से चलाए जा रहे ऑपरेशन समाधान के कारण उन्हें खासा नुकसान पहुंचा है। नक्सलियों का कहना है कि सरकार 2017 से उनके खिलाफ अभियान चलाए हुए है। इस अभियान का असर यह हुआ कि उनके अधिकार क्षेत्र जिसे वे रेड गोरिल्ला जोन के तौर पर आइडेंटिफाइड करके रखे हुए थे या दूसरे शब्दों में जहां लाल गिलयारा मजबूत था ऐसे कई स्थान हैं जहां से उन्हें या तो अपना इलाका छोड़ना पड़ा है या उन्हें पीछे हटना पड़ा है। सेंट्रल मिलिट्री कमेटी ने माना कि नक्सलियों की गिरफ्तारियों के कारण नक्सली विरोध कमजोर पड़ गया है।

अब तक 4483 काॅमरेड के मारे जाने का जिक्र भी
नक्सलियों की सेंट्रल मिलिट्री कमीशन की ओर से जारी पर्चे में कहा गया है कि अब तक 4483 कामरेड मारे गए हैं। इनमें 283 ऐसे थे जो पीएलजीए हमले में मारे गए हैं। इसके अलावा 839 महिला कामरेड भी मारी गई हैं। नक्सलियों ने माना है कि मरने वाले कामरेड की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

हमारे ऑपरेशन पर इसका कोई असर नहीं: आईजी
आईजी सुंदरराज पी ने कहा कि नक्सलियों के पास लड़ाके नहीं बचे हैं। ऐसे में नक्सलियों ने साथियों को मोटिवेट करने सालभर पीएलजीए मनाने का निर्णय लिया है। हम दुश्मन को कमजोर नहीं आंक रहे हैं लेकिन नए पैंतरे का हमारे ऑपरेशन पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।



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