कठिन वक्त में दोस्ती काम आती है, धर्म नहीं
बीते वर्ष की कठिनाइयों से सबक सीखते हुए और नव वर्ष की मंगल कामना व उम्मीद को देखते हुए अभिनय गुरुकुल एक्टर स्टूडियो में गुलजार लिखित नाटक "खुदा हाफिज' का मंचन किया गया। नव वर्ष में लोगों को दोस्ती का सबक सिखाने के लिए संस्था की ओर से नए साल के पहले दिन इस नाटक का मंचन किया गया। खास बात यह थी कि इसकी शुरुआत थियेटर आर्टिस्ट स्व. डॉ. मदन मोहन माथुर की 40 साल पुरानी ऑडियो वॉयस से हुई। डॉ. माथुर ने थियेटर के लिए यह आवाज दी थी औ कुछ संवाद अपनी आवाज में रिकाॅर्ड किए थे इसलिए यह नाटक डॉ. माथुर को समर्पित किया गया।
संस्था के संचालक अरू व्यास ने बताया कि हम जिस प्रकार से बीते वर्ष में कठिन समस्याओं से उबर पर पार आए हैं तो लोगों को अब सबक सीखना चाहिए कि किस प्रकार से दोस्ती को कायम रखें और रिश्तों को महत्व देें धर्म को नहीं। नाटक के जरिए यह संदेश दिया गया कि धर्म मन की चीज है लेकिन दुनिया सिर्फ रिश्तों से चलती है और इंसानियत काम आने वाली चीज है। नाटक का निर्देशन अरू स्वाति व्यास ने किया और अभिषेक, अशोक, दीपिका, राम और जयंत ने मंच पर किरदार निभाए।
करीम व अवतार की दोस्ती पर ‘खुदा हाफिज’
‘खुदा हाफिज’ अवतार व करीम की कहानी है जो कलकत्ता के दंगों में एक जगह पर मिलते हैं लेकिन दोनों एक-दूसरे से कतराते हैं। एक दिन अवतार पूछता है, भाई, सही बताओ? तुम करीम खान हो या करीम सिंह या फिर करीम अहमद ...। ये सुनकर दोस्त चुप्पी साध लेता है। जब दंगे जोर पकड़ लेते हैं तो दोनों एक-दूसरे को अपना असल नाम बताते हैं।
यह जानकर पहले तो दोनों एक-दूसरे बचने की कोशिश करते हैं लेकिन बाद में दोनों की दोस्ती का रंग परवान चढ़़ता है। यह दोस्ती ज्यादा दिन नहीं टिकती और दंगों में करीम पर गोली लगती है और वह मारा जाता है। ऐसे में अवतार अपने इस दोस्त को आवाज लगाता हुआ चिल्लाता-रोता फिरता है। उस वक्त अवतार महसूस करता है कि आज वह कितना अकेला है और कठिन वक्त में धर्म का कोई महत्व नहीं सिर्फ अच्छे रिश्ते और दोस्ती ही काम आती है।
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